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2 Oct 2026, Fri

सकरी तहसील में कागजों का खेल निराला, खसरा लॉक तो ब्लैंक पेपर का सहारा, अवैध प्लाटिंग के प्रकरण में कथित कमाई का आरोप, स्थगन के बावजूद नामांतरण की चर्चा… साहबों की डिजिटल कलाकारी पर उठे सवाल, जांच हुई तो खुलेंगे राज…

बिलासपुर,,,, जिले के सकरी तहसील में अवैध प्लाटिंग को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं! आरोपों के मुताबिक नियमों के तहत कार्रवाई करने के बजाय अवैध प्लाटिंग से जुड़े खसरों को एक ही प्रकरण क्रमांक के तहत दर्ज कर ऐसा रास्ता बनाया गया… जिसमें जमीन सरकारी रिकॉर्ड में ‘प्रकरणाधीन’ भी दिखाई देती रही… और कथित तौर पर सौदेबाजी का रास्ता भी खुला रहा… अब इसे प्रशासनिक व्यवस्था कहें या ‘कागजों की कलाकारी’, सवाल तो उठना ही है! बताया जा रहा है! कि तहसीलदार सकरी के प्रभार क्षेत्र के विभिन्न गांवों में अवैध प्लाटिंग से प्रभावित खसरों पर स्थगन लगाने के लिए उच्चाधिकारियों को प्रस्ताव भेजने अथवा पूरे मामले को उनके संज्ञान में लाने के बजाय कई खसरों तथा अलग-अलग भू-स्वामियों के नाम दर्ज जमीनों को एक ही प्रकरण क्रमांक के तहत दर्ज किया जाता था… ऑनलाइन व्यवस्था में किसी खसरे पर प्रकरण दर्ज होने के बाद उसकी रजिस्ट्री नहीं हो सकती… ऐसे में रिकॉर्ड में खसरा ‘लॉक’ दिखने लगा…


आरोप है! कि इसी व्यवस्था का कथित तौर पर फायदा उठाया गया… अवैध प्लाटिंग से जुड़े खसरों पर बी-121 के तहत प्रकरण दर्ज किए गए… और दस्तावेज के रूप में सादा कागज यानी ब्लैंक पेपर अपलोड कर दिया गया… अब सरकारी रिकॉर्ड में मामला मौजूद था… लेकिन उसके दस्तावेज में क्या है! इसका जवाब शायद वही सादा कागज दे सकता था… सबसे गंभीर आरोप यह है! कि यदि किसी ब्रोकर या भू-कारोबारी को ऐसे खसरे की रजिस्ट्री करवानी होती थी… तो उसे कथित तौर पर संबंधित लोगों से संपर्क करने के लिए कहा जाता था… जमीन को कितने टुकड़ों में बेचना है! उसके हिसाब से कथित तौर पर रकम तय होने और मोटी राशि वसूले जाने के आरोप हैं! रकम लेने के बाद प्रकरण के अंतिम आदेश में भी सादा कागज अपलोड कर मामला नस्तीबद्ध कर दिए…

जाने की बात कही जा रही है! यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं! तो डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है! सरकार ने ऑनलाइन व्यवस्था इसलिए विकसित की है! ताकि रिकॉर्ड पारदर्शी हों, नागरिकों को सुविधा मिले और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे… लेकिन यहां आरोप यह है! कि जिस व्यवस्था का उद्देश्य पारदर्शिता था… उसी के तकनीकी प्रावधानों को कथित तौर पर कमाई का रास्ता बना दिया गया… चर्चा यह भी है! कि कथित वसूली में उच्चाधिकारियों के नाम का भी इस्तेमाल किया गया… हालांकि इस दावे के समर्थन में फिलहाल कोई पुख्ता प्रमाण सामने नहीं आया है! इसलिए इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है! दूसरी ओर आरोप है! कि वास्तविक स्थिति उच्चाधिकारियों से छिपाई गई… और उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई… मामला तब और गंभीर हो जाता है! जब स्थगन वाले खसरों पर नामांतरण किए जाने के आरोप सामने आते हैं! बताया गया है! कि कुछ खसरों पर उच्चाधिकारियों द्वारा स्थगन लगाए जाने के बावजूद नामांतरण की कार्रवाई हुई… यदि जांच में यह सही पाया जाता है! तो यह सीधे तौर पर आदेशों के पालन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर प्रश्न होगा… यानी सवाल सिर्फ अवैध प्लाटिंग का नहीं… बल्कि रजिस्ट्री से लेकर नामांतरण तक पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता का है! आखिर किस खसरे पर कौन-सा प्रकरण दर्ज हुआ? उसमें कौन-से दस्तावेज अपलोड हुए? अंतिम आदेश में ब्लैंक पेपर क्यों लगाया गया? स्थगन के बावजूद नामांतरण किस आधार पर हुआ? और सबसे बड़ा सवाल,क्या इस पूरी प्रक्रिया में किसी ने आर्थिक लाभ लिया?
अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर निष्पक्ष जांच की है। संबंधित प्रकरणों की फाइल, ऑनलाइन रिकॉर्ड, आदेश, नामांतरण और रजिस्ट्री से जुड़े दस्तावेजों की जांच हो तो तस्वीर खुद सामने आ सकती है!

फिलहाल सकरी तहसील में चर्चा यही है! कि जिस ‘सादे कागज’ पर कुछ लिखा नहीं था… कहीं वही पूरी कहानी तो नहीं लिख गया? हालांकि आरोपों की आधिकारिक पुष्टि और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है! जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी…

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प्रधान संपादक -हरबंश सिंह होरा
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