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21 Sep 2026, Mon

जस्टिस बंगला से गोलबाजार तक बाइक पर ‘सर्कस’, ट्रैफिक वाले शायद छुट्टी मनाते रहे! युवक कभी लेटा, कभी खड़ा होकर स्टंट करता रहा—संडे की भीड़ में सिस्टम की नजर आखिर कहां थी, चालान की रफ्तार कैमरे तक पहुंची या स्टंटबाज तक?

बिलासपुर,,,, शहर की सड़कों पर यातायात व्यवस्था की एक और तस्वीर सामने आई है! जो ट्रैफिक सिस्टम की निगरानी और सड़क सुरक्षा के दावों पर सीधे सवाल खड़े करती है! रविवार को जब लोग परिवार और बच्चों के साथ बाजार के लिए निकले थे… उसी दौरान एक युवक चलती बाइक पर कभी लेटकर, कभी खड़े होकर और कभी हैंडल से हाथ हटाकर खतरनाक स्टंट करता नजर आया…
बताया जा रहा है! कि युवक कलेक्टर बंगले के सामने वाले इलाके से लेकर मुख्य बाजार और गोलबाजार तक इसी तरह बाइक दौड़ाता रहा… रास्ते में केंद्रीय जेल सहित कई महत्वपूर्ण इलाके आते हैं! कुछ ही दूरी पर हाई कोर्ट जस्टिस का आवास भी बताया जा रहा है! इसके बावजूद इतनी लंबी दूरी तक यह सब चलता रहा… लेकिन ट्रैफिक व्यवस्था की मौजूदगी कहां थी? और ट्रैफिक की तीसरी नजर किधर थी… ये बड़ा सवाल है! यहां सवाल सिर्फ युवक की पहचान और कार्रवाई का नहीं है! सवाल उस व्यवस्था का है! जिसे सड़क पर खतरा पैदा होने से पहले उसे रोकना था… बिलासपुर में ट्रैफिक को लेकर पहले भी सड़क किनारे स्थायी पार्किंग, मुख्य मार्गों पर भारी वाहनों की आवाजाही, स्कूल-कॉलेज क्षेत्रों में अव्यवस्था और ओवरलोड ऑटो में बच्चों की आवाजाही जैसे मुद्दे सामने आते रहे हैं! कई बार अधिकारियों तक सूचना पहुंचने के बावजूद कार्रवाई की गति को लेकर भी सवाल उठे हैं!

ई है बिलासपुर नगरिया तू देख बबुवा


एक तरफ आम वाहन चालक छोटी-सी गलती पर चालान की कार्रवाई का सामना करता है! दूसरी तरफ भीड़भाड़ वाले मार्ग पर कोई व्यक्ति बाइक को स्टंट का मैदान बना दे तो उसे रोकने वाला सिस्टम कहां दिखाई देता है?
रविवार की भीड़ में एक सेकंड का संतुलन बिगड़ता तो इसकी कीमत किसी राहगीर, बच्चे या परिवार को चुकानी पड़ सकती थी… स्टंट करने वाला युवक खुद घायल होता या कोई निर्दोष उसकी चपेट में आता—जिम्मेदारी तब किसकी होती?


यह वीडियो सिर्फ एक युवक की करतूत नहीं दिखा रहा… यह शहर की ट्रैफिक मॉनिटरिंग का वह हिस्सा सामने ला रहा है! जिसे शायद रोजमर्रा की कार्रवाई के आंकड़ों में देखना मुश्किल है!
सवाल यह भी है! कि कितने ट्रैफिक जवान संवेदनशील मार्गों पर निगरानी कर रहे हैं? क्या रविवार जैसे भीड़ वाले दिनों के लिए कोई विशेष निगरानी व्यवस्था है? क्या मुख्य बाजार तक पहुंचने वाले मार्गों पर स्टंट और खतरनाक ड्राइविंग रोकने के लिए प्रभावी पेट्रोलिंग होती है? अगर कैमरे में यह घटना आ सकती है! तो ट्रैफिक पुलिस की नजर में क्यों नहीं आई?
शहर में सड़क किनारे पार्किंग, भारी वाहनों और स्कूली बच्चों की सुरक्षा जैसे सवाल पहले से मौजूद हैं! अब यह वीडियो उसी सूची में दिनदहाड़े स्टंटबाजी और कमजोर निगरानी का एक और सवाल जोड़ रहा है!
यह एक वीडियो है—लेकिन सवाल पूरे शहर का है!
जो दिखाई दे गया, उस पर तो कार्रवाई होगी ही; जरूरत इस बात की है कि जो रोज हो रहा है और कैमरे में नहीं आ रहा, उस पर ट्रैफिक व्यवस्था की नजर कब जाएगी?
सड़क किसी की निजी रेसिंग ट्रैक नहीं। सवाल सिर्फ स्टंटबाज से नहीं—उस सिस्टम से है, जिसके सामने यह सब होने के बावजूद निगरानी पर सवाल खड़े हो गए।

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प्रधान संपादक -हरबंश सिंह होरा
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