
00 कलेक्टर एसपी मंत्री विधायक सब के समक्ष लगाई न्याय की गुहार
00 सीएमएचओ ने दी जांच की झप्पी

बिलासपुर,,, कोरोना कॉल और उसके बाद अस्तित्व में आए निजी अस्पताल जिला और सिम्स हॉस्पिटल के रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं! या तो ज्यादातर अस्पतालों में नसबंदी ऑपरेशन करने लायक तक व्यवस्था नहीं है! या फिर सरकार के डॉक्टर वेल ट्रेंड नही! सवाल तो स्वास्थ्य महकमे और सुशासन के उस दावे का है! जिसके हल्ला में ये सरकार आई! मामला छोटे से मुफ्त में होने वाले नसबंदी ऑपरेशन से कमाई का है! जिसके चक्कर मे बेटी की आंत कट गई! और पिता को अपनी बेटी को लेकर जिला एसकेबी फिर जिला अस्पताल और फिर अपोलो ले जाना पड़ा! 7 लाख रुपये लग गए! अब पिता गुहार लगा रहा कि उसके साथ जो हुआ वो किसी के साथ न हो! इसके लिए उसने कलेक्टर एसपी मंत्री विधायको सबसे गुहार लगाई! इधर सीएमएचओ जांच की बात कर रहे! पर सवाल ये है! कि इसकी रिपोर्ट आएगी कार्रवाई होगी कि ये आवेदन भी डंप कर दिया जाएगा!

ये पब्लिक है,
पब्लिक अब जान गई है! कि निरीक्षण बैठक, जांच, रिपोर्ट ये सबका मतलब क्या होता क्या है!

सब देख रहै इसी न्यायधानी के एक हॉस्पिटल में एक मरीज के एक की बजाय दूसरे पैर का ऑपरेशन कर दिया गया! एक अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही से तो नवजात बच्चे के हाथ को राजधानी के अस्पताल में कटवाकर उसकी जान बचानी पड़ी! पर किसी की आत्मा नही कचोटी!

कोरोना त्रासदी के दौरान 100 से अधिक शिकायते निजी अस्पतालों से आई पर आज तक किसी की जांच नही की गई!

मंगलसुत्र- चर्चित किम्स में सरकारी योजना को नकार प्रसूता को दो दिन में छुट्टी देने और दुर्व्यव्हार कर मरीज के पति से मंगलसुत्र गिरवी रखवाकर बिल वसूलने के आरोप लगे पर जांच रिपोर्ट आने के बाद निजी अस्पताल संचालक के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय पुलिस चौकी की तरह कोर्ट जाने का फेना टिका दिया!
ये है मामला
तखतपुर क्षेत्र के ग्राम लखासर निवासी सखाराम निर्मलकर ने बताया कि वे अपनी बेटी सुमन को नसबंदी ऑपरेशन के लिए जिला अस्पताल लेकर गए! जहां डॉ वंदना चौधरी ने परीक्षण करने के बाद उन्हें नसबंदी के लिए जरहभाटा के एसकेबी हॉस्पिटल में ले जाने कहा कि वहॉ 15-17 हजार में अच्छे से ऑपरेशन हो जाएगा!

श्री निर्मलकर ने बताया कि उनकी बात से वे अपनी बेटी सुमन को एसकेबी हॉस्पिटल ले गए! शाम को ऑपरेशन के बाद जब सुमन को वार्ड में शिफ्ट किया गया! तब दर्द और लगातार उल्टियां होने के बाद भी सुमन को छुट्टी दे दी गई! और कहा गया कि किसी तरह की तकलीफ नहीं होगी ले जाइए और होगी तो फिर आप फोन करिए! वह रातभर दर्द से कराहती रही दूसरे दिन जब वे लोग उसे फिर जिला अस्पताल लेकर पहुंचे तो वहां स्थिति बिगड़ने पर अपोलो ले जाया गया! सखाराम ने बताया कि अपोलो में जांच के दौरान पता चला कि नसबंदी ऑपरेशन के दौरान उसकी आंत कट – फट गई. बड़ी मुश्किल से उसकी जान बच सकी अभी भी उसका इलाज चल रहा! पीड़िता के पिता ने अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टर के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग की ताकि फिर किसी बेटी के साथ ऐसा ना हो अब देखना होगा कि स्वास्थ्य महात्मा और प्रशासन सुशासन के दावे वाली सरकार के इस दावे को कैसे और कब तक पूरा करेंगे कि वाकई सुशासन है!
आयुष्मान के बाद भी आम आदमी के बस से बाहर हुई चिकित्सा
सरकारी ढोल में कितना पोल है! इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है! चिकित्सा इतनी महंगी हो गई! कि नसबंदी से बिगड़े केस के बाद एक पिता को अपनी बेटी की जान बचाने लिए 7 लाख रुपये में चिकित्सा लेना पड़ा! एक मिस्त्री अपोलो में ब्रेन हैमरेज से भर्ती है! उसके ऑपरेशन का 3 लाख 50 हजार और आईसीयू का 40 हजार रुपये रोजाना का खर्च बताया गया! आयुष्मान यहां कबूल नही इसलिए उसके परिवार के लोग रकम के इंतेजाम करने भटक रहे!
हालात ये है! ऐसे में पहले से ही ले देकर परिवार की गाड़ी खिंचने वाले मध्यमवर्गीय और गरीब परिवार अपने या अपने परिजनों के इलाज के लिए इतनी बड़ी रकम कहा से लाएंगे ये बड़ा सवाल है!
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