
बिलासपुर,,, बिलासपुर के सरकण्डा मुक्तिधाम में जहाँ एक ओर चिताएं जल रही हों, राख उड़ रही हो, हर कोना मौन और भय का पर्याय हो — वहाँ अगर आपको माता की जय-जयकार सुनाई दे, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग श्रद्धा से मत्था टेकते दिखाई दें… तो समझ लीजिए कि यह कोई आम जगह नहीं ये है! सरकण्डा का मुक्तिधाम, जहाँ विराजमान हैं! श्मशान वासिनी माँ कालरात्रि 🙏
हर साल नवरात्र पर जब शहर में मंदिरों की घंटियाँ बजती हैं! आरती गूंजती है! उस समय सरकण्डा मुक्तिधाम भी किसी तीर्थ से कम नहीं होता फर्क बस इतना है!

कि यहाँ चिता की आग के बीच श्रद्धा की ज्योत जलती है! दिन ढले जब श्मशान में सन्नाटा होता है! तो वहीं माँ कालरात्रि के दरबार में उमड़ती है! भीड़ — महिलाएं, बच्चे, बुज़ुर्ग… सब अपनी मुरादें लेकर आते हैं! और माँ के चरणों में झुककर मानो मृत्यु से जीवन मांगते हैं!

जब चिता बनी मंदिर की नींव – माँ कालरात्रि का चमत्कारी प्राकट्य
करीब चार दशक पहले ये जगह एक सुनसान वीरान श्मशान थी! ना मंदिर, ना श्रद्धा… बस राख, चिता और सन्नाटा था! यहाँ एक कुटिया में रहा करते थे!
नगर निगम के चौकीदार सुखदेव शेंडे, जो नवरात्र पर अपनी पत्नी और बेटे कमल राव शेंडे के साथ माँ की पूजा करते थे!
इसी बीच एक दिन जबलपुर से एक परिवार अपनी बेटी को लेकर यहाँ पहुँचा कहते हैं! उस बच्ची पर प्रेतबाधा थी! बाबा सुखदेव ने झाड़-फूंक शुरू की और वही हुआ जो किसी को उम्मीद नहीं थी! उस बच्ची के भीतर की आत्मा बाबा से कहने लगी कि वह अब यहीं रहेगी!
बाबा ने पूरे श्मशान की परिक्रमा कराई और अंत में वह आत्मा जाकर एक अकोल के पेड़ के नीचे बैठ गई — “उसने कहा अब मैं यहीं वास करूंगी”
तीन दिन बाद बच्ची एकदम स्वस्थ होकर लौट गई! बाबा ने जिस पेड़ के नीचे यह चमत्कार देखा, वहाँ खुदाई शुरू कर दी… और खुदाई के दौरान माँ कालरात्रि की प्रतिमा स्वयंभू रूप में प्रकट हो गई!
श्मशान बना श्रद्धा का धाम, जहाँ मृत्यु भी मौन हो जाती है
तब से लेकर आज तक — इस श्मशान में सुबह-शाम माँ कालरात्रि की पूजा होती है! यहाँ आठों पहर और बारहों महीने अगर कुछ स्थिर है! तो वह है! भक्तों की श्रद्धा और माँ की कृपा!
मंदिर के मुख्य पुजारी सीताराम तिवारी, जो स्वयं इस चमत्कार के साक्षी रहे हैं! बताते हैं! “माँ कालरात्रि अपने दरबार में आने वाले किसी भी भक्त को खाली हाथ नहीं लौटाती!
नवरात्रि के दौरान यहाँ खास आयोजन होता है! माँ का दरबार रोशनी से जगमगाता है! वहीं पास में चिताएं भी जलती रहती हैं! एक साथ मृत्यु और मोक्ष, भय और भक्ति, अंधकार और ज्योति का अद्भुत संगम रहता है!
श्मशान की चौखट पर आस्था का दीप
जहाँ कभी औरतें दिन में भी कदम रखने से डरती थीं! आज वहाँ महिलाएं रात्रि के अर्ध पहर तक माँ के भजन गाती हैं! प्रसाद चढ़ाती हैं! और अपनी संतानों की खुशहाली की मन्नत मांगती हैं!
यह सिर्फ एक मंदिर नहीं, ये उस दिव्य रहस्य की जीवित कहानी है — जहाँ मृत्यु के गर्भ से जन्म हुआ माँ के एक ऐसे रूप का, जो स्वयं मृत्यु को मात देती है! वो है मां कालरात्रि 🙏🙏
श्मशान की राख से उठती ये आरती, धधकती चिताओं के बीच गूंजते जयकारे — यह सब इस बात का प्रमाण हैं! कि जहाँ सच्ची श्रद्धा होती है! वहाँ श्मशान भी तीर्थ बन जाता है!
नवसंस्कार की शुरुआत मृत्यु के द्वार से सरकण्डा मुक्तिधाम की ये कथा न केवल माँ कालरात्रि के चमत्कार की गवाह है! बल्कि यह भी बताती है! कि धर्म और आस्था का कोई स्थायी स्थान नहीं होता — वह वहाँ प्रकट होती है! जहाँ विश्वास होता है!
नवरात्रि के इस पर्व पर जब अग्नि और भक्ति एक साथ जलते हैं! तब जन्म लेती है! एक ऐसी परंपरा, जो मृत्यु को भी मोक्ष में बदल देती है!
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