
बिलासपुर,,, न्यायधानी में शिक्षा के नाम पर सरेआम लूट और जालसाजी का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है! जहां व्यापार विहार के रसूखदार कोयला कारोबारी जैन बंधु, जो अब तक कोयले के काले खेल में माहिर हैं! अब नौनिहालों के भविष्य के साथ ‘कूटरचना’ का खेल खेल रहे हैं! सिंघवी लख्मीचंद ट्रस्ट के नाम पर संचालित व्यापार बिहार स्थित ‘बिरला ओपन माइंड इंटरनेशनल स्कूल’ बिना किसी वैध मान्यता और प्राइमरी शिक्षा के अधिकार के, पालकों की जेब पर डकैती डाल रहा है!
एक मान्यता, दो दुकानें: C.B.S.E कोड की चोरी…
इस पूरे खेल का सबसे चौंकाने वाला पहलू संबद्धता कोड’ की हेराफेरी है! स्कूल प्रबंधन द्वारा एडमिशन रसीदों पर C.B.S.E कोड 3330502 का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है! जबकि यह कोड असल में मोपका स्थित बिरला ओपन स्कूल का है! व्यापार विहार वाली शाखा पूरी तरह अवैध है! जिसे मोपका की मान्यता की आड़ में ‘धोखाधड़ी का केंद्र’ बना दिया गया है! यह सीधे तौर पर कूटनीति और जालसाजी का मामला है! जिसमें हजारों बच्चों का भविष्य दांव पर लगा है!
नियमों की धज्जियां: न फीस कमेटी, न सरकारी किताबें...
छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव द्वारा जारी फीस विनियमन अधिनियम 2020 को रसूखदार संचालकों ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया है!
किताबों का सिंडिकेट: छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की किताबों का नामोनिशान नहीं है! तोरवा स्थित ‘मंजूषा पुस्तकालय’ से महंगी प्राइवेट पब्लिकेशन की किताबें और वर्कबुक खरीदने के लिए पालकों को मजबूर किया जा रहा है!
अवैध वसूली का नंगा खेल खेल…
हर साल एडमिशन फीस के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है! कॉशन मनी डकार ली जाती है! और सुरक्षा मानकों का कहीं अता-पता नहीं है! पारदिर्शता के नाम पर स्कूल की वेबसाइट या सूचना पटल पर फीस का कोई विवरण मौजूद नहीं है!
R.T.E एक्ट का गला घोंटा…
निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 के प्रावधानों को ठेंगा दिखाते हुए यह संस्थान केवल व्यावसायिक लाभ के लिए चल रहा है! C.B.S.E की शर्तों 2.4.7 के खिलाफ जाकर ड्रेस और किताबें निर्धारित दुकानों से लेने का दबाव बनाया जा रहा है! ट्रस्ट के पंजीयन उद्देश्यों में प्राथमिक शिक्षा का जिक्र तक नहीं है! फिर भी ‘शिक्षा के इस काले कारोबार’ को अंजाम दिया जा रहा है!
विभाग की चुप्पी: अधिकारियों को भी ‘हिस्सा’?...
जिला शिक्षा विभाग की इस मामले में चुप्पी और जांच में देरी कई गंभीर सवाल खड़े करती है! क्या शिक्षा विभाग के आला अधिकारी इन कोयला कारोबारियों के रसूख के आगे नतमस्तक हैं? बिना मान्यता के वर्षों से चल रहे इस फर्जीवाड़े की जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई न होना, विभाग और स्कूल माफिया के बीच ‘गठजोड़’ की पुष्टि करता है!
अगर शासन-प्रशासन ने इस संरचनात्मक समस्या पर तुरंत कड़ा प्रहार नहीं किया… तो अभिभावकों का सिस्टम से भरोसा उठना तय है! देखना यह है! शिक्षा के मंदिर को ‘व्यापारिक मंडी’ बनाने वाले इन सफेदपोशों पर कार्यवाही कब होती है! तमाम सूरते हाल के बावजूद अभिभावकों और छात्रों को शासन के निर्देशों के अनुसार राहत मिल जाए… इसके लिए जरूरी है! कि आदेशों को वास्तविकता में लागू करने की कवायद कर ले,न्यायधानी में यह अभी भी दूर की कौड़ी बना हुआ है!
सिस्टम की इसी सड़ांध से लोग जब त्रस्त हो जाते है! तो बादाम खाओ जैसे कांड सामने आते है! लगता है! बिलासपुर के शिक्षा विभाग को भी ऑपरेशन बादाम के बाद ही होश आएगा…
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