बिलासपुर,,, स्थित छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में मेडिकल छात्रों की पढ़ाई को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए चंपा से एक और देहदान प्राप्त हुआ है, जिससे संस्थान में उपलब्ध शवों की संख्या बढ़कर 19 हो गई है। एनाटॉमी की पढ़ाई के लिए शवों की महत्ता को देखते हुए यह एक बेहद महत्वपूर्ण योगदान माना जा रहा है। सिम्स के डीन डॉ. मूर्ति का बयान: सिम्स के डीन, डॉ. मूर्ति ने बताया कि दान किए गए शरीर को पूरी गरिमा और सम्मान के साथ संरक्षित किया जाता है और यह चार वर्षों तक सुरक्षित रहता है, जिससे मेडिकल छात्रों को मानव शरीर की संरचना का गहन अध्ययन करने का अवसर मिलता है। यह कदम मेडिकल छात्रों के लिए ज्ञान अर्जन में सहायक साबित होता है, क्योंकि पुस्तकें और डिजिटल माध्यमों से अध्ययन के बावजूद वास्तविक मानव शरीर पर अध्ययन करना जरूरी है। देहदान का महत्व: देहदान का महत्व केवल चिकित्सा शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज को नई दिशा देने का भी कार्य करता है। एक चिकित्सक के लिए सैद्धांतिक ज्ञान जितना आवश्यक है, उतना ही महत्वपूर्ण वास्तविक शरीर की संरचना को प्रत्यक्ष रूप से समझना भी है। ऐसे में, देहदान करने वाले व्यक्ति का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनता है। सामाजिक जागरूकता और अभियान: भारत में अभी भी देहदान को लेकर जागरूकता की कमी है, जबकि यह चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने में अहम भूमिका निभाता है। कई बार शवों की अनुपलब्धता के कारण छात्रों को अपनी पढ़ाई में कठिनाई होती है, लेकिन जब कोई व्यक्ति मृत्यु के बाद अपना शरीर चिकित्सा के लिए दान करने का संकल्प लेता है, तो यह न केवल भविष्य के डॉक्टरों के लिए बल्कि समाज के लिए भी एक अमूल्य उपहार साबित होता है। सिम्स प्रशासन ने भी देहदान को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता पर जोर दिया है, ताकि अधिक से अधिक लोग इस पुनीत कार्य में भाग ले सकें और चिकित्सा शिक्षा को सशक्त बना सकें।