
बिलासपुर,,, नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 की शुरुआत के साथ ही जिले में निजी स्कूलों की मनमानी एक बार फिर खुलकर सामने आ रही है! किताबों, यूनिफॉर्म और मान्यता के नाम पर अभिभावकों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है! हालात इस स्तर तक पहुंच रहे हैं! कि शिक्षा अब सेवा से ज्यादा कारोबार का रूप लेती दिख रही है! और अभिभावकों के पास विकल्प सीमित होते जा रहे हैं!
C.B.S.E पैटर्न’ के नाम पर गुमराह का खेल….
जिले में कई स्कूल बिना वैध C.B.S.E संबद्धता के केवल C.B.S.E पैटर्न का बोर्ड लगाकर प्रवेश दे रहे हैं! अभिभावकों को यह भरोसा दिलाया जा रहा है! कि संस्थान केंद्रीय बोर्ड से जुड़ा है! जबकि वास्तविक स्थिति अलग है! इस तरह की भ्रामक प्रस्तुति सीधे तौर पर अभिभावकों के साथ धोखाधड़ी की श्रेणी में आती है! और बच्चों के भविष्य को लेकर भी अनिश्चितता पैदा करती है! ऐसी स्थिति में यह मांग लगातार उठ रही है! कि जिला स्तर पर सभी मान्यता प्राप्त स्कूलों की ब्लॉकवार सूची सार्वजनिक की जाए, जिसमें यह स्पष्ट हो कि किस स्कूल को किस कक्षा तक मान्यता प्राप्त है!
किताब और यूनिफॉर्म में बढ़ती ‘मोनोपोली...
अभिभावकों की सबसे बड़ी परेशानी किताबों और यूनिफॉर्म को लेकर सामने आ रही है! कई स्कूल प्रबंधन अभिभावकों को तय दुकानों से ही सामग्री खरीदने के लिए बाध्य कर रहे हैं! बाजार में उपलब्ध विकल्पों के बावजूद महंगी निजी प्रकाशकों की किताबें थोप दी जाती हैं! और हर साल यूनिफॉर्म के डिजाइन में बदलाव कर अतिरिक्त खर्च का दबाव बनाया जाता है! इस पूरे सिस्टम में पारदर्शिता का अभाव साफ नजर आता है! जरूरत इस बात की महसूस की जा रही है! कि स्कूल सत्र शुरू होने से पहले ही किताबों की पूरी सूची, उनके प्रकाशक और मूल्य के साथ सार्वजनिक करें… ताकि अभिभावक स्वतंत्र रूप से खरीदारी कर सकें…
नन्हे बच्चों पर भी महंगाई का बोझ…
स्थिति इतनी विसंगतिपूर्ण हो चुकी है कि नर्सरी और केजी जैसे शुरुआती वर्गों में भी 3 से 4 साल के बच्चों के लिए 4000 से 5000 रुपये तक के बुक-सेट बेचे जा रहे हैं। जबकि सरकारी नीति स्पष्ट रूप से ‘खेल-खेल में शिक्षा’ पर जोर देती है। इसके बावजूद छोटे बच्चों पर अनावश्यक शैक्षणिक और आर्थिक बोझ डाला जा रहा है, जो न तो व्यावहारिक है और न ही नीति के अनुरूप।
बाजार और स्कूलों के बीच सांठगांठ के आरोप...
शहर के प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों—गोल बाजार, सदर बाजार, सिटी कोतवाली चौक, शिवम मॉल, अग्रसेन चौक, गांधी चौक और बुधवारी बाजार—में स्कूलों और दुकानदारों के बीच अघोषित समझौतों की शिकायतें सामने आ रही हैं। अभिभावकों को “विशेष स्कूल” के नाम पर उन्हीं दुकानों से सामान लेने के लिए मजबूर किया जाता है, जहां कीमतें सामान्य बाजार से अधिक बताई जाती हैं। कई मामलों में पक्के बिल के बजाय कच्चे पर्चों पर बिक्री की बात भी सामने आती है। इतना ही नहीं, कुछ स्कूल अपने ही परिसर में किताब और यूनिफॉर्म बेचते हुए नियमों की अनदेखी करते नजर आ रहे हैं, जिससे अभिभावकों पर सीधा दबाव बनता है।
कार्रवाई की मांग, अब इंतजार नहीं….
मौजूदा हालात में अभिभावकों के बीच यह भावना मजबूत हो रही है कि अब सिर्फ दिशा-निर्देश नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। जिला शिक्षा विभाग द्वारा मान्यता प्राप्त स्कूलों की अद्यतन सूची सार्वजनिक करने, हर स्कूल में मान्यता संख्या और उसकी वैधता अवधि प्रदर्शित करने, भ्रामक ‘CBSE’ प्रचार करने वालों पर धोखाधड़ी का मामला दर्ज करने और किताब-यूनिफॉर्म में कमीशनखोरी पर रोक लगाने की मांग लगातार उठ रही है। इसके साथ ही जिला शिक्षा अधिकारी के नेतृत्व में जांच दल बनाकर औचक निरीक्षण और अभिभावकों के लिए गोपनीय शिकायत तंत्र विकसित करने की जरूरत भी महसूस की जा रही है।
शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल….
यह मुद्दा केवल फीस, किताब या यूनिफॉर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और भरोसे से जुड़ा हुआ है। अगर समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो शिक्षा का अधिकार धीरे-धीरे एक सीमित वर्ग तक सिमटता नजर आएगा।
आखिरी सवाल…
सवाल सीधे प्रशासन के सामने है—क्या इस बार निजी स्कूलों की मनमानी पर सख्त लगाम लगेगी, या हर साल की तरह यह मुद्दा भी शिकायतों तक सिमट कर रह जाएगा?
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