बिलासपुर,,,,
खरीफ सीजन के बीच बिलासपुर जिले के किसानों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। मौसम की अनिश्चितता और खेती की बढ़ती लागत के बीच अब खाद की कालाबाजारी ने किसानों को आर्थिक संकट में डाल दिया है। मस्तूरी, बिल्हा, तखतपुर, कोटा और रतनपुर क्षेत्र से लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं कि निजी कृषि केंद्रों में किसानों से निर्धारित मूल्य के बजाय दो से तीन गुना तक कीमत वसूली जा रही है। कई किसानों का आरोप है कि खाद देने के नाम पर अतिरिक्त कृषि सामग्री खरीदने का दबाव भी बनाया जा रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार बोवनी का समय निकलने के डर से किसान मजबूरी में महंगे दाम पर खाद खरीद रहे हैं। विरोध करने पर खाद नहीं मिलने की आशंका के कारण अधिकांश किसान खुलकर शिकायत भी नहीं कर पा रहे हैं। किसानों का कहना है कि जिले के कई निजी खाद विक्रेताओं द्वारा कृत्रिम कमी का माहौल बनाकर मनमानी की जा रही है, जबकि कृषि विभाग की ओर से प्रभावी निरीक्षण और कार्रवाई देखने को नहीं मिल रही है।
किसानों का आरोप है कि यदि प्रशासन निजी कृषि केंद्रों में औचक निरीक्षण कर स्टॉक रजिस्टर, बिक्री रजिस्टर और बिलों की जांच करे तो कालाबाजारी का पूरा खेल सामने आ सकता है। उनका कहना है कि निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली करने वाले विक्रेताओं के लाइसेंस निलंबित कर उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
कृषि विशेषज्ञों का भी मानना है कि खरीफ सीजन में समय पर उचित मूल्य पर खाद उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि किसानों को पर्याप्त मात्रा में खाद नहीं मिलेगी तो इसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ेगा, जिससे कृषि अर्थव्यवस्था और बाजार दोनों प्रभावित होंगे।
किसानों का कहना है कि सरकार एक ओर किसानों की आय बढ़ाने और खेती को लाभकारी बनाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर खाद की कालाबाजारी पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। बढ़ती लागत और कर्ज के बोझ के बीच महंगी खाद खरीदना किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
अब जिले के किसानों ने जिला प्रशासन और कृषि विभाग से मांग की है कि मस्तूरी, बिल्हा, तखतपुर, कोटा और रतनपुर सहित पूरे जिले में विशेष जांच अभियान चलाकर निजी खाद विक्रेताओं की जांच की जाए। यदि अधिक कीमत वसूली, कृत्रिम कमी या अन्य अनियमितताएं पाई जाती हैं तो दोषियों के खिलाफ कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाए। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते कालाबाजारी पर रोक नहीं लगी तो खरीफ की फसल पर गंभीर असर पड़ेगा और हजारों किसान आर्थिक संकट में फंस जाएंगे। फिलहाल जिलेभर के किसानों की निगाहें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं।

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