
बिलासपुर,,, नगर निगम के ठेकेदारों पर यह गंभीर सवाल उठ रहा है! कि क्या वे प्लेसमेंट कर्मियों के पारिश्रमिक का पैसा ब्याज में चला रहे हैं! यह सवाल तब उठता है! जब निगम प्रशासन के अफसर यह दावा कर रहे हैं! कि उन्होंने सभी प्लेसमेंट कंट्रेक्टरों के बिलों का भुगतान पूरी तरह से कर दिया है! बावजूद इसके, दर्जनों कर्मियों के चार महीने से अधिक का पारिश्रमिक और पीएफ राशि का भुगतान नहीं हुआ है! तो आखिरकार इसका पैसा कहां जा रहा है?
निगम प्रशासन का कहना है! कि निगम में फंड की कोई कमी नहीं है! और नियमित स्टाफ तथा अधिकारियों को हर माह की पहली तारीख को वेतन का भुगतान किया जा रहा है! इसके अलावा, प्लेसमेंट ठेकेदारों के सभी बिल भी पूरी तरह से क्लियर कर दिए गए हैं! तो फिर मेहनत करने वाले प्लेसमेंट श्रमिकों का पारिश्रमिक और पीएफ राशि क्यों नहीं दी जा रही है?
जब मीडिया की टीम ने निगम के अतिक्रमण शाखा और पंप हाउस के प्लेसमेंट श्रमिकों से बात की, तो उन्होंने बताया कि पिछले तीन महीनों का और इस महीने का पारिश्रमिक उन्हें अभी तक नहीं मिला है! साथ ही, उनके पीएफ की राशि भी चार से छह महीने से जमा नहीं की जा रही है! यह स्थिति चिंताजनक है! क्योंकि कई श्रमिक लगातार अपनी मेहनत के बावजूद बिना पारिश्रमिक के काम करने को मजबूर हैं!
इस पर सवाल उठता है! कि क्या ठेकेदार कर्मियों के पारिश्रमिक का पैसा ब्याज में लगा रहे हैं! ऐसा संदेह इसलिए उत्पन्न हो रहा है! क्योंकि इससे पहले भी प्लेसमेंट ठेकेदारों द्वारा पारिश्रमिक से 93 करोड़ रुपये का एडवांस घोटाला सामने आ चुका है! यह घोटाला इस बात का इशारा करता है! कि ठेकेदार शायद श्रमिकों के पैसे का गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं! इतना ही नहीं, इन ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए जांच अधिकारी उपायुक्त ने सख्ती बरती थी! जिसके परिणामस्वरूप तत्कालीन उपायुक्त का ट्रांसफर कर दिया गया था!
भ्रष्टाचार को खत्म करने के दावे के साथ पांच साल के बनवास के बाद भाजपा की नगर सरकार फिर से सत्ता में आई है! अब यह देखना होगा कि क्या सरकार इस मामले में ठेकेदारों पर लगाम लगा पाती है! और क्या हाड़तोड़ मेहनत करने वाले श्रमिकों को उनके पारिश्रमिक का नियमित भुगतान समय पर मिलेगा! यह सवाल अहम है! क्योंकि श्रमिकों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाले ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है! अगर निगम प्रशासन और नगर सरकार इस मामले में कार्रवाई नहीं करती! तो इससे मजदूरों के बीच असंतोष और प्रशासनिक निष्क्रियता की भावना पनप सकती है!
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