बिलासपुर–मस्तूरी,,,, अगर किसानों के आरोप
सही हैं! तो एरमसाही सहकारी समिति में सिर्फ खाद नहीं बंट रही थी…. बल्कि भरोसा भी टूट रहा था…. किसानों का कहना है! कि वे डीएपी लेने पहुंचे, लेकिन उन्हें दूसरी खाद थमा दी गई। आरोप यह भी है! कि बिल किसी और उत्पाद का बनाया गया…. और कीमत भी ज्यादा वसूली गई…. इन शिकायतों ने पूरे इलाके में हलचल मचा दी है! मामला यहीं नहीं रुका… किसानों का दावा है! कि कुछ उत्पाद उनकी इच्छा के विरुद्ध भी दिए गए…. शिकायतें बढ़ीं तो कृषि विभाग की टीम जांच के लिए पहुंची। अब पूरे मामले की सच्चाई जांच पर टिकी है! बिलासपुर जिले में खाद के नाम पर किसानों को ‘दिनदहाड़े लूटा’ जा रहा है! एरमसाही धान खरीदी केंद्र 687 से सामने आया है! ऐसा ‘काला खेल’ जिसे सुनकर शासन-प्रशासन की आंखें भी फटी रह जाएं… यहां डीएपी खाद मांगने वाले अन्नदाता को एनपीके थमाकर 470 रुपये प्रति बोरी का ‘चूना’ लगाया जा रहा है! सूत्रों की मानें तो इस ‘सिंडिकेट’ में सोसायटी के बाबू से लेकर सत्ताधारी दल के ‘सफेदपोश’ तक ‘कमीशन की मलाई’ चाट रहे हैं! घोटाले का आंकड़ा लाखों पार करने की आशंका है!
घोटाले की ‘मिर्ची-मसाला’ क्रोनोलॉजी, पढ़कर उड़ जाएंगे होश….
‘डीएपी’ बोलो, ‘एनपीके’ तोलोः किसान सोसायटी पहुंचता है डीएपी लेने, लेकिन प्रबंधक उसे एनपीके 20:20:10 थमा देता है। नाम बड़ा, दर्शन छोटे!
बिलिंग का ‘ब्रह्मास्त्र’: खाद एनपीके की, लेकिन बिल कट रहा है इफ्को 0:52:34 का। यानी कागजों में हेरफेर कर ‘काले को सफेद’ किया जा रहा है।
470 रु की ‘ओपन लूट’: बाजार में 1000 रु की बोरी, यहां 1470 रु में। एक बोरी पर 470 रु का सीधा ‘कमीशन’। 2500-3000 बोरी खपाने का टारगेट, तो हिसाब लगा लो कितनी ‘चांदी’ कट रही है।
‘सागरिका-हरियाली’ का जबरन तड़काः इतने से पेट नहीं भरा तो इफ्को सागरिका और हरियाली के डिब्बे भी किसानों के मत्थे जबरन मढ़े जा रहे हैं। लेना है तो लो, वरना खाद नहीं मिलेगी!
700-800 बोरी का ‘जखीरा’ तैयार, MP से आ रही ‘नकली’ खेप?
फिलहाल सोसायटी में निजी कंपनियों की एनपीके खाद की 700-800 बोरी डंप है। आरोप है कि ये खाद मध्य प्रदेश के झाबुआ से मंगाई जा रही है। चौंकाने वाली बात ये कि जब डिजिटल मैप पर फैक्ट्री का पता खंगाला गया तो वहां कोई वैध यूनिट ही नहीं मिली। यानी ‘नकली खाद’ का शक और गहरा गया है।
कृषि विभाग का छापा, पर ‘बबलू भाई’ का कॉन्फिडेंस हाई!
शिकायत पर कृषि विभाग की अधिकारी अनुराधा नाग और एडीओ/एडीएम की टीम ने छापा मारा। लेकिन समिति प्रबंधक बबलू घृतलहरे पर कोई असर नहीं। सूत्र बताते हैं कि प्रबंधक ने जांच को ‘घुमाने-टालने’ की पूरी कोशिश की।
सबसे बड़ा बम तो तब फूटा जब प्रबंधक बबलू घृतलहरे ने खुलेआम कह दिया – ‘सहकारिता विभाग मेरी जेब में है, जो उखाड़ना है उखाड़ लो, जहां शिकायत करना है कर दो!’
उनकी इस ‘दबंगई’ को देखकर लगता भी है कि शायद सहकारिता विभाग सच में उनकी जेब में है, तभी तो आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
भाजपा के नेता का का दिखा रसूख
चर्चा तो यहां तक है कि जांच टीम के पहुंचते ही भाजपा के नेता का ‘रसूख वाला फोन’ भी घनघना गया। आरोप है कि बीजेपी द्वारा मामले को ‘शांत’ कराने का पूरा दबाव बनाया गया। यानी सोसायटी के कर्मचारी किसके इशारे पर ‘खेल’ कर रहे हैं, ये समझना मुश्किल नहीं।
भाजपा नेता की भूमिका पर भी अब सवाल उठ रहे हैं। क्या राजनीतिक संरक्षण के दम पर ही यह ‘खाद माफिया’ फल-फूल रहा है?
कृषि विभाग के मुख्य संचालक ‘जीडी मीटिंग’ में व्यस्त होने के कारण नहीं आ पाए, इसलिए जांच अधूरी है। अब किसान इस पूरे ‘सिंडिकेट’ की शिकायत सीधे कलेक्टर से करने वाले हैं।
सवाल बड़ा है: जब प्रबंधक खुद कह रहा है कि विभाग उसकी जेब में है, और जब नेता जी पर मामले को दबाने के आरोप लग रहे हैं, तो क्या बिलासपुर में सहकारिता विभाग ‘ठेके’ पर चल रहा है? क्या कलेक्टर इस ‘खाद माफिया’ पर बुलडोजर चलाएंगे या फिर एक और जांच ‘फाइलों में दफन’ हो जाएगी?
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