Breaking
4 Sep 2026, Fri

आत्मानंद स्कूल में ‘कबाड़ का आत्मानंद, बच्चों के लिए आया लाखों का फर्नीचर छत पर हुआ विराजमान, कुर्सियां टूटीं तो डायस भी जंग खा गया—5 से 10 गुना महंगी खरीदी के आरोपों ने खोल दी सरकारी सिस्टम की पोल…

बिलासपुर,,, अंधेर नगरी, चौपट व्यवस्था’ की तस्वीर देखनी हो तो सरकंडा मुक्तिधाम के सामने स्थित पंडित शिव दुलारे स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पहुंचना काफी है! जहाँ विद्यार्थियों की सुविधा के लिए सरकारी धन से खरीदा गया  लाखों रुपये से अधिक का फर्नीचर आज स्कूल की छत पर कबाड़ के पहाड़ में बदल चुका है! कुर्सियां, टेबल और अन्य सामग्री बारिश, पानी और जंग की मार झेल रही हैं! जिस सामान को बच्चों की सुविधा बढ़ानी थी…. वह अब सरकारी धन के इस्तेमाल पर बड़ा सवाल बन चुका है!
सबसे बड़ा सवाल यही है! कि जिस फर्नीचर की खरीद और सप्लाई करीब डेढ़ साल पहले तक चल रही थी…. वह इतनी कम अवधि में उपयोग लायक क्यों नहीं रहा…. स्कूल से जुड़े लोगों के मुताबिक शुरुआत से ही इसकी गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे…. पुराने फर्नीचर की तुलना में नया सामान कमजोर था… और सामान्य छात्र उपयोग में ही कुर्सियां-टेबल टूटने लगीं… आरोप है! कि स्थानीय स्तर पर तैयार मॉडल के फर्नीचर को बाहरी अथवा ‘इंपोर्टेड’ बताकर स्कूलों में सप्लाई किया गया…. कीमत को लेकर भी गंभीर आरोप हैं! कहा जा रहा है! कि जिस फर्नीचर की स्थानीय बाजार में कीमत सामान्य स्तर पर थी… उसकी सरकारी खरीदी 5 से 10 गुना तक अधिक दरों पर हुई…. यदि खरीदी और भुगतान के दस्तावेज इन आरोपों की पुष्टि करते हैं! तो मामला केवल खराब गुणवत्ता का नहीं… बल्कि सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग और गंभीर वित्तीय अनियमितता की जांच का बनता है!

लाखों खर्च कर स्कूल भेजा या कबाड़ बनाने?…

विभागीय तंत्र के साथ स्कूल प्रबंधन की भूमिका भी सवालों में है! आखिर लाखों रुपये खर्च कर ऐसा फर्नीचर क्यों खरीदा गया… जिसकी उपयोगिता कुछ ही समय में खत्म हो गई?
आरोप तो यहां तक है! कि लाखों रुपये का फर्नीचर खरीदा और स्कूल भेजा ही इसलिए गया…. कि वह उपयोग के बजाय कबाड़ बनकर रह जाए…  यदि यह आरोप गलत है! तो खरीदी की फाइल, स्वीकृत दर, आपूर्ति आदेश, गुणवत्ता परीक्षण, भुगतान और सप्लाई स्वीकार करने की प्रक्रिया जांच के दायरे में क्यों नहीं आनी चाहिए?
प्राचार्य पी. मंडल ने स्पष्ट किया… कि मौजूदा छत पर पड़ा फर्नीचर उनकी पदस्थापना से पहले खरीदा गया था…  उनके अनुसार यह फर्नीचर करीब डेढ़ साल से छत पर पड़ा है! स्कूल स्तर पर इसकी मरम्मत कराने का प्रयास भी किया गया… लेकिन फर्नीचर की गुणवत्ता इतनी खराब थी…. कि उसकी वेल्डिंग तक संभव नहीं हो सकी…. स्कूल में पर्याप्त जगह नहीं होने के कारण इसे छत पर रखना पड़ा… प्राचार्य के मुताबिक अनुपयोगी फर्नीचर के निस्तारण की जिम्मेदारी जिला शिक्षा विभाग की है!
प्राचार्य का यह पक्ष वर्तमान कार्यकाल की खरीद से उन्हें अलग करता है! लेकिन इससे खरीद, गुणवत्ता जांच, सप्लाई स्वीकार करने, सरकारी संपत्ति के संरक्षण और समय पर निस्तारण से जुड़े सवाल खत्म नहीं होते…. स्कूल प्रबंधन से यह भी पूछा जाना चाहिए कि सामान की हालत खराब होने के बाद उसे हटाने और विभाग को समय रहते सूचना देने के लिए क्या कदम उठाए गए…

हजारों का डायस, चारों छत पर जर्जर…

मामला सिर्फ कुर्सी-टेबल तक सीमित नहीं है! स्कूल की छत पर चार डायस भी पड़े हैं! विभाग ने तत्कालीन समय प्रत्येक डायस की कीमत करीब 50 से 55 हजार रुपये बताई थी… यानी चार डायस की कीमत 2 लाख रुपये से अधिक है! विद्यार्थियों के कार्यक्रमों और शैक्षणिक गतिविधियों के लिए खरीदा गया यह सामान भी अब खुले आसमान के नीचे मौसम की मार झेल रहा है!

कबाड़ का बोझ, छत और लिंटर पर भी खतरा…

मामले का सबसे चिंताजनक पहलू अब सरकारी धन की बर्बादी से आगे निकलकर बच्चों की सुरक्षा तक पहुंच गया है! छत पर लंबे समय से जमा भारी कबाड़ के बोझ से भवन की छत में क्रैक आने और लिंटर के दबने की स्थिति सामने आई है! यदि यह स्थिति बनी रहती है! तो विद्यार्थियों और स्कूल स्टाफ की सुरक्षा पर गंभीर खतरा खड़ा हो सकता है!
सवाल यह है! कि जब लाखों रुपये का फर्नीचर अनुपयोगी हो चुका था… और लंबे समय से छत पर पड़ा था…. तब उसे हटाने अथवा सुरक्षित स्थान पर रखने के लिए समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए गए? फर्नीचर तो कबाड़ बना ही, क्या अब उसके बोझ से स्कूल भवन की संरचना भी खतरे में डाली जा रही है?
छत और लिंटर की स्थिति की तकनीकी जांच जरूरी है! अब सवाल केवल 5 से 10 गुना महंगी खरीदी, घटिया गुणवत्ता और सरकारी धन की संभावित बर्बादी का नहीं, बल्कि उन बच्चों की सुरक्षा का भी है! जो रोज इसी भवन में पढ़ने आते हैं!

इसी स्कूल में पहले भी फर्नीचर पर उठे थे सवाल…

इस स्कूल का फर्नीचर विवाद नया नहीं है! पहले भी नए फर्नीचर की आपूर्ति के दौरान पुराने फर्नीचर को निजी संस्थानों में भेजे जाने को लेकर सवाल उठे थे… आरोप था… कि पुराने सरकारी फर्नीचर को विभागीय अनुमति के बिना निजी संस्थानों तक पहुंचाया गया… इस मामले में तत्कालीन प्राचार्य पर कार्रवाई हुई… और उनके निलंबन तक की नौबत आई थी… एक ही स्कूल में सरकारी फर्नीचर को लेकर पहले विवाद और अब लाखों रुपये का नया फर्नीचर छत पर कबाड़ बनना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है!
एक स्कूल नहीं, आत्मानंद व्यवस्था की परीक्षा आत्मानंद स्कूलों के विस्तार के दौरान बड़े पैमाने पर फर्नीचर, कुर्सी, टेबल और अन्य सामग्री खरीदी गई… ऐसे में सरकंडा स्कूल की छत पर पड़ा यह कबाड़ केवल एक स्कूल की कहानी मानकर खत्म नहीं किया जा सकता…. दूसरे आत्मानंद स्कूलों में पहुंचे फर्नीचर की गुणवत्ता और उनकी मौजूदा स्थिति की भी जांच जरूरी है!
सवाल तत्कालीन शिक्षा विभागीय अधिकारियों, संबंधित मातहत तंत्र और स्कूल प्रबंधन—सभी से है! किसने खरीदा, किस दर पर खरीदा, किसने गुणवत्ता जांची, किसने सप्लाई स्वीकार की, स्कूल ने इसे सुरक्षित क्यों नहीं रखा और जब सामान अनुपयोगी होने लगा तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?यदि फर्नीचर बर्बाद करने मे वर्तमान वर्तमान स्कूल प्रबंधन है! तो उस पर किस प्रकार की कार्रवाई हहोगी इसकी जवाबदेही कौन तय करेगाl….
सरकारी धन से खरीदा गया सामान विद्यार्थियों की सुविधा के लिए था… छत पर कबाड़ बनने के लिए नहीं… सरकंडा स्थित आत्मानन्द हायर सेकंडरी हाई स्कूल।स्कूल की छत पर पड़ा 10 लाख रुपये से अधिक का ‘कबाड़ का पहाड़’ अब सिर्फ टूटे फर्नीचर की तस्वीर नहीं है! यह सरकारी खरीदी, गुणवत्ता, कीमत, स्कूल प्रबंधन, विभागीय निगरानी और बच्चों की सुरक्षा पूरी व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है।

Author Profile

प्रधान संपादक -हरबंश सिंह होरा
Latest entries

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You Missed