
बिलासपुर-कलेक्टर के आदेश को भी नकारते हुए जिला अस्पताल के सिविल सर्जन अपनी मनमानी पर उतर आए हैं जी हां एक ऐसा ही मामला आचार संहिता खत्म होते ही देखने को मिला है। गौरतलब है कि जिला अस्पताल में ड्राइवर के पद पर कार्य करने वाले राजकुमार मल्ल की पिछले दिनों कलेक्टर से शिकायत की गई थी।
कि वह मरीज के परिजनों से बदतमीजी करता है और स्टाफ से भी बदसलूकी करता है।शिकायत के बाद कलेक्टर ने तत्काल अनुशंसा करते हुए उसका ट्रांसफर कोटा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कर दिया गया था। लेकिन जनाब का रसूख को तो देखिए अब सिविल सर्जन खुद उनके नाम से आदेश निकल रहे हैं और जिला अस्पताल में पुनः पद स्थापना दे रहे हैं इसे देखकर तो यही लगता है। कि जिला अस्पताल के सिविल सर्जन भी कलेक्टर की नहीं सुन रहे हैं और अपने करीबी राजकुमार को सही का राजकुमार बनाकर अपने पास रखना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि जिला अस्पताल में ड्राइवरों की कमी है वहां कई ड्राइवर मौजूद है मगर राजकुमार की बात ही अलग है। क्योंकि जानकार बताते है कि वह सिविल सर्जन के घर का काम और बाहर का काम दोनों देखता था। ये कहे कि राजकुमार के साथ ऐसा राज़ है जिसे सिविल सर्जन बांटते हैं या ये भी हो सकता है कि उसके जाते ही शायद सिविल सर्जन को कुछ अधूरा महसूस हो रहा होगा, यही कारण है, कि उन्होंने आचार संहिता खत्म होते ही अपने राजकुमार को अपने पास बुला लिया इस आदेश को गौर से पढ़िए इसमें सिर्फ राजकुमार मलका ही नाम लिखा है। आगर जिला अस्पताल में किसी ड्राइवर की कमी होती तो उसका नाम लिखे बिना भी सिविल सर्जन मांग कर सकते थे कि जिला अस्पताल को एक वाहन चालक की आवश्यकता है।

इसमें नाम लिखने जैसी तो कोई बात ही नहीं होती लेकिन नामजद आदेश या कहीं की मांग पत्र जारी कर जिला अस्पताल के सिविल सर्जन ने खुद के ही पैरों में कुल्हाड़ी मार दी है ।अब आप खुद ही सोच सकते हैं। कि जो सिविल सर्जन कलेक्टर के आदेश को भी दरकिनार कर रहा हो, उस पर क्या ही कार्रवाई हो सकती है। और क्या इस प्रकार का आदेश जारी करने से पहले इन्होंने कलेक्टर की अनुमति ली थी यह अभी एक प्रश्न चिन्ह है। आपको बता दे कुछ दिनों पहले भी राज कुमार ने जिला हॉस्पिटल आए मरीज के परिजन को भी तप्पड़ मार दिया था! ये बात हवा की तरफ फैली तब मीडिया वाले सिविल सर्जन से जानकारी लेने पहुंचे तब सिविल सर्जन इस बात को दरकिनार कर दिया ऐसे ही जिला हॉस्पिटल में कई कारनामे सिविल सर्जन के द्वारा होता है!
वहा के स्टाफ भी 100 बेड हॉस्पिटल में डिलीवरी वालो से पैसे की मांग भी करते है! जिसकी जानकारी सिविल सर्जन को होने के बाद भी कोई एक्शन नहीं लेते लगता है कि सिविल सर्जन अनिल गुप्ता का प्रश्नल हॉस्पिटल हो जहा खुद की मनमानी चले
बिलासपुर जिला अस्पताल में समय पर नहीं पहुंची डॉक्टर:लेट से डिलीवरी होने पर बिगड़ी नवजात की हालत, प्राइवेट अस्पताल में भर्ती;प्रसूता ने लगाए आरोप
बिलासपुर 1 महीने पहले
लेट से डिलीवरी होने पर बिगड़ी नवजात की हालत, प्राइवेट अस्पताल में भर्ती;प्रसूता ने लगाए आरोप|
समय पर इलाज नहीं मिलने से बिगड़ गई नवजात की तबीयत।
बिलासपुर के जिला अस्पताल में गर्भवती महिला की डिलीवरी कराने समय पर डॉक्टर नहीं पहुंची, जिसके चलते उसकी तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद आनन-फानन में पहुंची डॉक्टर ने उसका ऑपरेशन कर दिया। लेकिन, डिलीवरी में देरी होने के कारण बच्चे की स्थिति गंभीर हो गई है। डॉक्टर ने उसे प्राइवेट अस्पताल भेज दिया है। इधर प्रसूता और उसके परिवार ने डॉक्टर पर इलाज में लापरवाही बरतने का भी आरोप लगाया है।
पचपेड़ी क्षेत्र के ग्राम केंवतरा की रहने वाली डिडनेश्वरी पाटले ने बताया कि उसे 23 अप्रैल को प्रसव पीड़ा शुरू हुई, तब वह जिला अस्पताल पहुंची। इस दौरान उसे असहनीय दर्द हो रहा था। इस दौरान अस्पताल के स्टाफ उसकी नॉर्मल डिलीवरी कराने का दावा करते रहे। लेकिन जब महिला का दर्द बहुत ज्यादा बढ़ गया, तब स्टाफ नर्स सहित दूसरे कर्मचारियों ने उसकी डिलीवरी कराने की कोशिश की। मगर तब तक महिला की हालत गंभीर हो गई। फिर बाद में स्टाफ ने कहा कि डॉक्टर के आने पर वह देखेंगी, जिसके बाद ऑपरेशन करना पड़ेगा।
तबीयत बिगड़ने पर पहुंची डॉक्टर
महिला ने बताया कि जब दर्द से उसकी तबीयत बिगड़ने लगी, तब जाकर डॉक्टर अस्पताल पहुंची। उन्होंने जांच के बाद ऑपरेशन करने की बात कही। इस बीच शिफ्ट खत्म होने के बाद देर शाम उसे ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। जहां परेशान महिला ने पूछताछ की, तो पता चला कि डॉक्टर बाहर गए हुए हैं। स्टाफ के कॉल करने पर डॉक्टर फिर अस्पताल पहुंची। इसके बाद आनन-फानन में महिला का ऑपरेशन किया गया।
प्राइवेट असपताल में भर्ती है नवजात, 5 दिनों से नहीं मिल पाई है मां

इधर डिलीवरी के बाद बच्चे की हालत गंभीर होने पर उसे निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। प्रसूता ने कहा कि उसके बच्चे की हालत ठीक नहीं है। डॉक्टरों ने उसे सिम्स भेजने के बजाय प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी। अब बच्चा प्राइवेट अस्पताल में भर्ती है। प्रसूता ने कहा कि वो डिलीवरी के 5 दिन बाद भी अपनी नवजात का चेहरा नहीं देख पाई है। महिला ने बताया कि उसने अपने बच्चे का सही इलाज कराने की मांग को लेकर शिकायत भी की है।
सिविल सर्जन बोले- खुद से परिजन ले गए हैं प्राइवेट अस्पताल
इधर, महिला के आरोपों पर सिविल सर्जन डॉ अनिल गुप्ता का कहना है कि जिला अस्पताल में महिलाओं की समय पर डिलीवरी कराने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, नवजात बच्चों का भी सरकारी अस्पताल में उपचार कराने के निर्देश दिए गए हैं। परिजनों के कहने पर प्राइवेट अस्पताल भेजा जाता है। इस मामले में मुझे पूरी जानकारी नहीं है।
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