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21 Jan 2026, Wed

बिलासपुर:-मामला शनिचरी बाजार, बिलासपुर में दुकान नंबर 46 बिलासा चौक के पास अंचल कुमार केशरवानी एवम अन्य के स्वामित्व एवम कब्जे से जुड़ा है, जिसकी कहानी 31/3/2006 से शुरू होती है न्यालीण प्रक्रिया करते करते दाण्डिक प्रकरण क्रमांक 5/2017 धारा 145 दंड प्रक्रिया सहिता, ग्राम शनिचरी बाजार बिलासपुर में पारित आदेश दिनांक 15/11/2021 न्यायलय उपखण्ड मजिस्ट्रेट बिलासपुर द्वारा अंचल कुमार केशरवानी के पक्ष में कब्जा घोषित किया ततपश्चात, उक्त आदेश का पालन हेतु न्यायलय तहसीलदार बिलासपुर द्वारा अपने आदेश दिनाक 4/1/2022 को विधिवत कारवाही करते हुए पटवारी एवम पुलिस बल, सिटी कोतवाली की उपस्थिति में दिनांक 10/01/2022 को अंचल केशरवानी को कब्जा दिलाया गया, वैसे तो प्रकरण को यही समाप्त हो जाना था क्योंकि असल मालिक अंचल केशरवानी को उनके हक,अधिकार की सम्पति आखिरकार इतनी लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद मिल ही गयी !
लेकिन, भ्र्ष्टाचार की दुनिया मे कानूनी पेंचीदगीयो से अनभिज्ञ अंचल केशरवानी की असली अग्नि परीक्षा तो अब शुरू होनी थी कि विरोधी पक्ष ने उक्त कब्जा आदेश दिनांक 04/01/22 जो दिनांक 10/01/22 को पुलिस बल और पटवारी की मौजूदगी में एक्सीक्यूट भी हो गया, इस आदेश के विरुद्ध विरोधी पक्ष ने न्यायालय उपखण्ड बिलासपुर में इसी न्यायालय के पूर्व आदेश के खिलाफ रिकाल आदेश हेतु रिवीजन दायर कर दिया, जबकि उसी न्यायालय में यह न्यायिक प्रक्रिया नही अपनायी जा सकती है ! इस दूषित न्यायालीन प्रक्रिया के विरुद्ध आवेदक अंचल केशरवानी पुनः DJ साहब के यंहा से दिनांक26/02/2022 को स्टे लेकर आये, तब भी न्यायालय उपखण्ड मेजिस्ट्रेट बिलासपुर द्वारा प्रकरण के गुण-दोष के आधार पर लेकिन पूर्व में उक्त दुकान का कब्जा जो कि दिनांक 10/01/2022 को विधिवत अंचल केशरवानी को मिल चुका था, उक्ताशय के सम्बन्ध में कुछ भी उल्लेख न करते हुए प्रकरण को पुनः दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा-145 रिकाल मात्र किया गया ! इससे साबित होता है कि अंचल केशरवानी का उक्त दुकान पर कब्जा न केवल बरकरार था बल्कि कानूनी प्रक्रिया के तहत बकायदा तहसीलदार ने आदेशित कर कब्जा दिलाया था ! अब शुरू होती है भृष्टाचार की इन्तेहा, जिसकी कालिख वर्तमान तहसीलदार “मोर” की सुंदर -सी दिखने वाली मोर पँखो की छवि भी दागदार करती है !
न्यायलय उपखण्ड मजिस्ट्रेट बिलासपुर ने प्रकरण को किया तो था रिकॉल ताकि मृतक स्व निर्मलचन्द दुबे के वारिसान सहित उभय पक्षो को सुनवायी का अवसर मिल सके ?लेकिन यही पर तहसीलदार मोर ने दोनों पक्षों को सुने बिना, आवेदक एवम पीड़ित पक्ष अंचल केशरवानी के आरोपो अनुसार लम्बी सेटिंग के तहत बड़ी रकम का लेनदेन कर, आनन-फानन में पूर्ववत फैसले को ही बदल दिया, पीड़ित पक्ष के आरोपो में इसलिए भी दम है क्योंकि कुछ भी स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत नही हुआ ! तहसीलदार मोर साहब दिनांक 23/05/22 को शाम 04 बजे आदेश करते है, उसी दिन पार्टी को 05बजे नकल भी मिल जाती है, पूर्व सुनियोजित योजना के तहत उसी दिन उक्त कब्जा आदेश एक्जिक्यूट भी हो जाता है!
अभी घटना में ओर भी ट्विस्ट है कि जब पीड़ित पक्ष अंचल केशरवानी को उक्त सेटिंग्स की खबर लगती है तथा तहसीलदार मोर को भी अपनी गलती का, पदीय दुरुपयोग का अहसास होता है तो अब तहसीलदार मोर एक ऐसी बड़ी नोटनकी करते है, ताकि खुद के पाक-साफ होने का कुछ तो इंतजाम किया जा सके ? इसी प्रयास में तहसीलदार मोर ने, (जो 23/05/22 को असल स्वमी एवम कब्जाधारी अंचल केशरवानी के विरुद्ध फैसला करते है उसी दिन उक्त आदेश एक्जिक्यूट भी करवा देते है ) अगले ही दिन यानि दिनांक 24/05/22 प्रकरण में विद्धवान शासकीय अधिवक्ता, श्रीमान गोराहा महोदय को एक कार्यालयीन पत्र जारी कर सम्पूर्ण प्रकरण पर उनका कानूनी मत / सलाह मांगते है, यानि गलत फैसले के बाद ओर पदीय दुरुपयोग के बाद, अधिवक्ता की सलाह की जरूरत सूझती है, जबकि किसी मामले के उचित निराकरण में यदि तहसीलदार मोर को कानूनी ज्ञान का अभाव है तो प्रकरण के निराकरण के पहले विद्वान शासकीय अधिवक्ता से उनका अभिमत मांगा जाना था हालांकि विद्वान शासकीय अधिवक्ता श्री वीरेंद्र गौराह जी ने अपने सर्वोत्तम कानूनी ज्ञान का उपयोग करते हुये, विधि अनुसार जो अभिमत तहसीलदार मोर को लिखित में दिया वो तहसीलदार मोर के न केवल खिलाफ जाता है बल्कि तहसिलदार मोर के कानूनी ज्ञान में कमी एवम साफ साफ पदीय दुरुपयोग को दर्शाता है विशेष उलेखनीय ये भी है कि खुद को फंसते देख तहसीलदार मोर ने विद्वान अधिवक्ता वीरेंद्र गौराह जी द्वारा दिये गए लिखित एवेम कानूनी अभिमत को प्रकरण की फ़ाइल से ही गायब कर दिया पीड़ित पक्ष अंचल केशरवानी द्वारा उक्ताशय की जानकारी होने पर तत्काल एन्टी करप्शन ब्यूरो, पुलिस थाना को तहसीलदार मोर के ऊपर अपराध दर्ज करने की मांग किया है उलेखनीय यह भी है कि तहसीलदार मोर को अपने इस अवैध गैरकानूनी कार्य एवेम पदीय दुरुपयोग के मामले में तथा शासकीय दस्तावेज को प्रकरण में गायब करने में गंभीर प्रकृति का अपराध होने के कारण CRPC-197 का लाभ भी नही मिलेगा ऐसे मामलो में तहसीलदार के खिलाफ गंभीर धारा में अपराध दर्ज होना तथा उनकी तत्काल गिरफ्तारी होना आवश्यक है अन्यथा ऐसी मनमानीया ओर पदीय दुरुपयोग कभी नही रुकेगी ! कि जो मन मे आया करो ? नही चलेगा साहब !

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प्रधान संपादक -हरबंश सिंह होरा
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